.(आरे जंगल मुंबई की दर्दनाक दास्ताँ)...महाराष्ट्र
हुस्न का ये कत्ल इत्तेफाकन हुआ ,
थी शरारत जो मैं तुझमें पागल हुआ।
आरों- पे - आरे चले इस कदर,
था लगा ऐसा जैसे कि दंगल हुआ।
आशियां गिर गए थे मकां गिर गए ,
इस गबन में परिंदा था पागल हुआ ।
पेड़ थे ना गिरे बाग ही गिर गए ,
फिर घटाओं का रौशन न दामन हुआ।
जो भी आया बसर शज़र हाल पर,
देखकर ये कहर वो भी कायल हुआ।
परिंदों की महफ़िल लगी रात भर,
निष्कर्ष -ए-अंजुमन न बेहतर हुआ।
बंबई-ए- शहर सोता रहा रात भर,
बुरे दौर में भला कौन सहचर हुआ।
वक्त की मार देखे न ईश्वर कभी,
बाद में चाहे बंजर घर आंगन हुआ।
हुस्न का एक कत्ल इत्तेफाकन हुआ,
थी शरारत जो मैं तुझ में पागल हुआ।
शज़र- पेड़
बसर- इंसान
अंजुमन- सभा
आरे - जंगल(मुंबई) ......
आरा- औज़ार
alok yadav
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।