मन का नगर मुस्कराहटों से भर गया
उसको सोचना ही ऐसा जादू कर गया
धीमे धीमे इस तरह से शाम हो गई
सुरमा आसमान से सारा झर गया
उस रोज नदी में उतरते चांद को देखा
जिस तरह दिल में मेरे वो उतर गया
उस रात सितारों को देख हमको ये लगा
सोना किसी सुनार का कोसों बिखर गया
फूल सी पलकों में उसकी खुशबू बला की
इस तरह से छुआ अपना जी हुमर गया
आलोक आजकल जो ग़ज़ल लिख रहा
लफ्ज लफ्ज लग रहा है निखर गया
-आलोक