विज्ञापन

इस तरह से छुआ अपना जी हुमर गया

Alok Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन का नगर मुस्कराहटों से भर गया
        
                                                    
                            
उसको सोचना ही ऐसा जादू कर गया

धीमे धीमे इस तरह से शाम हो गई
सुरमा आसमान से सारा झर गया

उस रोज नदी में उतरते चांद को देखा
जिस तरह दिल में मेरे वो उतर गया

उस रात सितारों को देख हमको ये लगा
सोना किसी सुनार का कोसों बिखर गया

फूल सी पलकों में उसकी खुशबू बला की
इस तरह से छुआ अपना जी हुमर गया

आलोक आजकल जो ग़ज़ल लिख रहा
लफ्ज लफ्ज लग रहा है निखर गया
-आलोक
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Prasoon Saxena

973 कविताएं

View Profile