जो शब्दों में बँध जाए केवल, वह प्रेम भला क्या गहरा होगा?
जहाँ बात-बात की शर्त रहे, उस बंधन पर क्या पहरा होगा?
सच्चा अनुराग वही पावन, जो मौन भाषा में ढलता है,
बिन बोले जो नयनों से बहकर, सीधे हृदय में उतरता है।
न कोई वेश, न कोई दावा, न पन्नों पर कोई दस्तख़त,
दो आत्माओं का यह मिलन, होता है पूर्णतया निष्शर्त।
जहाँ शब्द ठहरकर थक जाते, वहाँ भाव का दीप प्रज्वलित है,
मौन की उस अतल गहराई में, प्रेम सदा ही सुरभित है।
जब आँखें ही सब कह जाएँ, और समझ ले दूजा मन की बात,
फिर भाषा के इस कृत्रिम जग की, क्या रह जाती भला औकात?
मौन ही तो वह सेतु है, जिस पर चलकर ईश्वर आता है,
बिन बोले ही यह निश्छल प्रेम, जग में यशस्वी हो जाता है।
जहाँ शोर न हो, अधिकार न हो, बस एक सहज समर्पण हो,
जहाँ एक-दूजे की साँसों में, बस ईश्वर का ही अर्पण हो।
इतिहास गवाह है मौन प्रेम ही, युग-युग तक अमर कहाया है,
जिसने बिना कहे सब सह लिया, उसी ने सच्चा श्याम पाया है।