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नीति के दोहे मुक्तक

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पाप
        
                                                    
                            
हिय में जिसके पाप हो, तीरथ गये न शुद्ध।
मदिरा घट तपाये से, फिर भी रहे अशुद्ध।।

मान
वृक्ष एक के पुष्पों से , विपिन सुवासित जान।
वैसे हि सु संतान से, कुल का जग में मान।।

सफलता का मंत्र
चुप से मिटे कलह सदा, दरिद्रता उद्योग।
जाग्रत का ही भय मिटे, यह जानत सब लोग।।

--अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

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4 वर्ष पहले
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