पाप
हिय में जिसके पाप हो, तीरथ गये न शुद्ध।
मदिरा घट तपाये से, फिर भी रहे अशुद्ध।।
मान
वृक्ष एक के पुष्पों से , विपिन सुवासित जान।
वैसे हि सु संतान से, कुल का जग में मान।।
सफलता का मंत्र
चुप से मिटे कलह सदा, दरिद्रता उद्योग।
जाग्रत का ही भय मिटे, यह जानत सब लोग।।
--अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
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