प्रकृति
हो धीरज वाणी उचित, या उदारता ज्ञान।
इनको मानो सहज गुण, नहि उपदेशन भान।।
शिष्टाचार
लघुता में गुरूता छिपी, गुरूता को लघु जान।
पहले बोले भेंट में, उसमें गुरूता मान।।
दुर्जन
दुर्जन को शिक्षा दिये, कबहुँ न सज्जन कोय।
जिमि जड़ सींचे दूध से, नीम न मीठी होय।।
- अशर्फी लाल मिश्र,
अकबरपुर, कानपुर।
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