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नीति के दोहे मुक्तक

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रकृति
        
                                                    
                            
हो धीरज वाणी उचित, या उदारता ज्ञान।
इनको मानो सहज गुण, नहि उपदेशन भान।।

शिष्टाचार
लघुता में गुरूता छिपी, गुरूता को लघु जान।
पहले बोले भेंट में, उसमें गुरूता मान।।

दुर्जन
दुर्जन को शिक्षा दिये, कबहुँ न सज्जन कोय।
जिमि जड़ सींचे दूध से, नीम न मीठी होय।।

- अशर्फी लाल मिश्र,
अकबरपुर, कानपुर।

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4 वर्ष पहले
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