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हम हारे तुम जीते गुसैयां

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम हारे तुम जीते गुसैयां,
        
                                                    
                            
अब काहे की टेक,नाथ काहे की टेक।

रात दिवस हम पुकार रहे,
तब भी दरश नाहीं गुसैयां।

पुकारत पुकारत छाले जीभ,
अब तो दरश देव गुसैयां।

हम हर विधि आज अनाथ,
आपहिं नाथ हमारे गुसैयां।

रात दिवस अपलक निहारूँ,
किस क्षण आवें हमारे गुसैयां।

आपहिं जनक आपहिं जननी,
आपहिं गुरुवर मेरे गुसैयां।

जग में है सब कुछ झूठा ,
आपहिं एक सत्य गुसैयां।

इस पातक को नाथ उबारो,
दीजै शरण मेरे गुसैयां।

©अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर,कानपुर।
 
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