विज्ञापन

दुपहरी जेठ की

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऊपर तपै तरनि,
        
                                                    
                            
नीचे तपै अवनि।
कौन विधि बीते,
दुपहरी जेठ की।।

भयभीत है पवन,
चपल नाहीं पात।
कौन विधि बीते,
दुपहरी जेठ की।।

उमस भरी दुपहरी,
स्वेद लथपथ तन।
कौन विधि बीते,
दुपहरी जेठ की।।

तरनि देता सन्देश,
निषेधाज्ञा आदेश।
कौन विधि बीते,
दुपहरी जेठ की।।

-अशर्फी लाल मिश्र,
अकबरपुर,कानपुर।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

437 कविताएं

View Profile

Shivendra Mishra

4 कविताएं

View Profile

Pandit Chandradutt

2936 कविताएं

View Profile