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भार्गव राम खण्डकाव्य

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आये थे देश देश के राजा बली,
        
                                                    
                            
उठा न सके पिनाक तिल भर।
जनक लली अब हो गईं उदास,
राजा जनक भी थे अब निराश।।

रुंधे कंठ से अब कह रहे जनक,
क्या धरती आज वीरों से खाली?
सुनि मिथिलापति कातर बचन,
सुनयना के भी अश्रु पूरित नयन।।

गुरुवर विश्वामित्र भी थे बैठे मंच,
कभी देखें विदेह अरु कभी लली।
कभी देखें मंच शिव पिनाक भारी,
क्या स्वयंबर के राजा हीन बली?

आदेश मिला मुझे निज गुरु का,
पिनाक संधान करो अब राम।
ले चरण रज, आशीषि गुरु पाइ,
यह सेवक पहुँचा पास पिनाक।।

मन ही मन कीन्ही शिव वंदना,
हो राजा जनक का संकल्प पूरा।
गुरु विश्वामित्र का सम्मान बढ़े,
हो रानी सुनयना का संकल्प पूरा।।
- अशर्फी लाल मिश्र
एक महीने पहले
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