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भार्गव राम खण्डकाव्य - 46

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शर चाप चढ़ाया जब ही राम
        
                                                    
                            
करतल ध्वनि से गूँजी सभा।
राम खैचत चाप दो टूक भयो,
थी थिरक पड़ी सिगरी सखियाँ।।

थी रानी सुनयना भी थिरक पड़ी,
अब बिन थिरके राजा जनक नहीं।
थी छोटी बहन अब सीय उर्मिला,
फुदक फुदक कर नृत्य करने लगी।।

दोनों कर में था अब शोभित,
भव्य जयमाल जनक लली।
दायें बायें मांडवी श्रुतकीर्ति,
दोनों राजा कुशध्वज लली।।

कुशध्वज राजा जनक भ्राता,
कर उठाय अब थिरकन लगे।
आये थे राजा स्वयंबर बली,
सब करतल ध्वनि करने लगे।।

सीय अधरन बिच दंत दिखें,
मनु पंगति खिली कुंद कली।
कपोल भी अब कुछ कह रहे,
मनोदशा अब जनक लली।।
-अशर्फी लाल मिश्र
2 महीने पहले
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