मेहनत में मैंने कमी न छोड़ी, रातों की नींद भी गँवाई थी,
पर वक्त का पहिया ऐसा घूमा, जब कोरोना की आफत आई थी।
सब बिखरा, सब छूटा मुझसे, मेरी मेहनत पर पानी फेर दिया,
जिस उम्र में उड़ना था मुझको, उस उम्र में गम ने घेर लिया।
बचपन से आज तक रखा है, खुद को हर एक बुराई से दूर,
नशा, फरेब और झूठी चमक से, दिल रहा है मेरा कोसों दूर।
पर किस्मत का खेल तो देखो, कोई सच्चा यार न मिल पाया,
दोस्ती का हाथ बढ़ाया जिससे, उसने ही बस दिल दुखाया।
आगे बढ़कर हर किसी की मदद को, मैंने हाथ बढ़ाया है,
पर न जाने क्यों इस दुनिया ने, मुझको ही बुरा ठहराया है।
निस्वार्थ भाव से साथ दिया, फिर भी इल्ज़ाम ही पाए हैं,
जिनके लिए मैं ढाल बना, वही घाव दे कर आए हैं।
इतनी मेहनत की इस तन पर, पर यह भी कम न हो पाया,
शायद इसी रूप को देख मेरे, सबने मुझसे किनारा बनाया।
अकेलेपन की इस धूप में, जब कोई न अपना पास मिला,
तड़प उठा यह दिल मेरा, तब जाकर एक नया दोस्त मिला।
अब अंदर एक खौफ सा है, कहीं यह भी दूर न चला जाए,
मेरी इस सूनी दुनिया को, फिर से न कोई तन्हा कर जाए।
पर माना कि मैं डरा हुआ हूँ, मैं हारा नहीं, नादान नहीं,
मेरी अच्छाई और मेरी मेहनत, किसी पहचान की मोहताज नहीं।
किस्मत जो भी फैसला करे, मैं थका ज़रूर हूँ, पर रुका नहीं हूँ,
परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मैं किसी के आगे झुका नहीं हूँ।
माता-पिता का मान बनूँगा, खुद पर अब विश्वास करूँगा,
इस मुश्किल वक्त को पार करके, मैं एक दिन इतिहास रचूँगा।