कोरे कागज़, काली कलम,
आज फिर तेरे नाम लिखूँ।
जो कह न पायी किसी से अब तक,
वो सारे जज़्बात लिखूँ।
कुछ आँसू स्याही बन जाये
कुछ यादें अल्फ़ाज़ बने।
जो दर्द दिल में कैद पड़ा है,
आज वही आगाज़ बनें।
कोरे कागज़ ने चुप रहकर,
हर ख़ामोशी को मेरी पढ़ लिया।
काली कलम ने टूटे दिल का,
हर एहसास यूँ गढ़ लिया।
कुछ सपने आधे छूट गए,
कुछ अपने राह बदल गए।
फिर भी उम्मीद की आख़िरी लौ,
मेरे दिल में आज भी जल गई।
जब दुनिया ने सुनना छोड़ा,
कागज़ मेरा हमराज़ बना।
काली कलम ने हर धड़कन को,
एक खूबसूरत अंदाज़ दिया।
कोरे कागज़ और काली कलम,
बस इतना-सा एहसान करना...
जब मेरा ज़िक्र कभी आए,
मेरी ख़ामोशी को भी बयां करना।
-अक्षि त्यागी