विज्ञापन

लोकतंत्र का “मर्मांत” मखौल- “म” मखौल

Akhilesh Joshi 'Anpadh'

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मनमोहन की मृदुल मुद्रा,
        
                                                    
                            
मुलायम की मधुर मुस्कान,
ममता का मुखर मंतव्य,
महबूबा का मायावी मान।

मल्लिकार्जुन की मंत्रणा में
मंथनों का मेला मिलता,
मायावती के महलों में
मौन महत्वाकांक्षा मिलती।

मनोज मंचों में मग्न मिलें,
माइक में मचलते शब्द,
मगर मोहल्लों में मेहनतकश मनुष्य
महँगाई में मिलता निःशब्द।

मतदाता मन में
मंगलमय मर्यादा माँगे,
मगर माननीय
मात्र मंत्रालयों का मान माँगे
मंदिर, मस्जिद, मजार, मठ—
माथों में मिलते मन्नत के मल्हार,
मगर मजदूर की मटमैली मजबूरी पर
मिलता मात्र मौन व्यवहार।

मौसम बदलते ही
मित्र-मंडलियाँ बदल जातीं,
मंच बदलते, मुखौटे बदलते,
मगर मंशाएँ नहीं बदल पातीं।

“म” से मानवता भी बनती है,
“म” से मरहम भी मिलता है,
मगर राजनीति के महाभोज में
“म” अक्सर “मैं” में बदलता है।

और अंत में—
‘अनपढ़’ मतदाता माथा मलता मिलता,
माननीय मिनरल वाटर में मुँह मटकाते मिलते,
मगर लोकतंत्र महोदय
माइक पकड़कर मात्र मुस्कुराते मिलते!
— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all