विज्ञापन

भ्रम कम हुआ

Akhilesh Joshi 'Anpadh'

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भीड़ बहुत थी,
        
                                                    
                            
पर साथ कोई नहीं था।

हाथ अनेक बढ़े,
पर कंधा एक भी नहीं मिला।

मन रिश्तों का उत्सव मनाता रहा,
ज़ेहन चुपचाप उनका लेखा लिखता रहा।

फिर एक दिन समझ आया—
दुनिया उतनी बुरी नहीं होती,
जितनी हमारी अपेक्षाएँ भोली होती हैं।

उस दिन से
हार मुझे डराती नहीं।

क्योंकि हर हार
मुझसे कुछ छीनकर नहीं गई,
वह केवल
एक भ्रम कम कर गई।

— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all