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शहीदों की संसद में — आज बस एक ही सवाल

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज तिरंगा जब ऊँचा लहराया, तो नभ से दर्दीली आवाज़ आई—
        
                                                    
                            
“जिस भारत के लिए मरे हम तब ,उस भारत की दीन खबर बताई?”

जब उन्होने पूछा तो मैने कहा—
“भारत अब आज़ाद है, अपना झंडा, अपना गान है,
दुनिया के मानचित्र पर,भारत की अलग पहचान है।”

तभी भगत सिंह मुस्काए,राजगुरु ने प्रश्न किया—
“क्या केवल झंडा फहराना ही आजादी का अर्थ हुआ?”

सुखदेव बोले—
“जिस भारत का सपना देखा,उसमें इंसान बड़ा होना था,
जाति-धर्म से ऊपर उठकर,भारत सबसे बड़ा होना था।”

तभी अशफाक़ुल्ला ख़ाँ आए,बिस्मिल ने गले लगाया—
दोनों ने मिलकर पूछा—“क्या हमने हिंदू-मुस्लिम में भारत को बाँटा था?”

चन्द्रशेखर आज़ाद गरजे—
“हमने तो आज़ादी के खातिर,अपना जीवन वार दिया,
तुमने क्यों अपने ही भाई को,नफ़रत का हथियार दिया?”

मंगल पांडे की आवाज़ आई—
“जिस विद्रोह की पहली ज्वाला,मेरे सीने से अंगार सी निकली थी,
वह ज्वाला तो भारत जोड़ने की थी,दिलों को तोड़ने की तो न थी!”

तभी वीर सावरकर आगे आए,आँखों में अंगार लिए—
“कालापानी की काल-कोठरी में,हमने कितने स्वप्न जिए।
जिस अखंड भारत का सपना,हमने अपने मन में पाला,
उस भारत की एकता को, मत करना कभी विराना।”

फिर झाँसी की रानी आईं,हाथ में चमक रही तलवार—
“जिस धरती पर बेटी ने,लड़ा था अपना अधिकार,
उस धरती पर आज भी बेटी,क्यों माँगे सुरक्षित संसार?”

झलकारी बाई बोलीं—
“रण में जाति नहीं पूछी थी, बस भारत माँ को जाना था;
आज भी भारत की बेटी को, निर्भय जीवन ही पाना था।”

फिर बिरसा मुंडा उठे,जंगलों से आई पुकार—
“जिस जल-जंगल-जमीन के खातिर,हमने लड़ी थी आर-पार,
उस धरती के हर वासी का,उन सब पर रहे बराबर अधिकार।”

उधर ऊधम सिंह खड़े हुए, आँखों में जलता इतिहास—
“जलियाँवाला के घावों को,भूल न जाना मेरे पास।”

सुभाष की शेर जैसी गर्जना गूँजी—
“खून दिया था हमने ताकि,भारत सिर ऊँचा रख पाए;
आजादी को केवल उत्सव नहीं,कर्तव्य बनाकर निभाए!”

गांधी की आवाज़ आई—
“सत्य की राह कठिन सही, लेकिन उसको छोड़ना मत;
नफ़रत चाहे जितनी आए, मानवता का हाथ छोड़ना मत।”

सरदार पटेल ने कहा—
“हमने रियासत जोड़कर,भारत का अखंड नक्शा बनाया था;
तुम अपने मन की सीमाओं में, क्यों भारत को बटवाया है?”

और फिर हजारों आवाज़ें, एक साथ गूँज उठीं—
“किसी ने तीखी कलम उठाई थी,किसी ने तलवार उठाई थी;
किसी ने मन से जेलें काटीं, किसी ने हॅसकर फाँसी पाई थी।
किसी ने खेतों से आवाज़ उठाई,किसी ने जंगल से हुंकार भरी;
किसी ने सीमा पर रक्त दिया, किसी ने घर की खुशियाँ जो हारीं।
तब किसी ने जाति नहीं पूछी, किसी ने धर्म नहीं पूछा था;
भारत माँ की पुकार सुनी, और अपना सर्वस्व लुटाया था।

इसलिए शहीदों की आँखों में आज भी एक सवाल है—
“क्या तुम हमें जाति में बाँटोगे, या बलिदान में पहचानोगे?
क्या तुम धर्म की दीवार उठाओगे, या भारत को गले लगाओगे?”

शर्मिदा है अब खुद से ,क्यो हमने अपनी बली चढाई,
ना तुम तब समझे ,ना आज समझना तुम हो चाहते,
अरे आजादी पाने खातिर क्यो ये परवाने जान गवाते,
ईक आजादी की सांसो खातिर हसते हसते फांसी चढ जाते।

मन मेरा टूट गया जब प्रश्नो के उत्तर से निरूत्तर पाया
आज शहीदो दो के सम्मुख चीर पहने खुद को नग्न पाया।

आओ आज प्रतिज्ञा लें—
नफ़रत को न पनपने देंगे, झूठ को न सम्मान देंगे;
जाति-धर्म से ऊपर उठकर ,भारत का मान बढ़ाएँगे।

तब पावन शहीदों की आत्माएँ, स्वर्ग से नीचे आएँगी,
तिरंगे को नमन करेंगी और मुस्कुराकर गाएँगी—
“अब भारत सचमुच आज़ाद है, अब भारत सचमुच महान है;
क्योंकि इस भारत के हर दिल में,भारत माँ का सम्मान है!”
जाति ,धर्म बलिदान अनेक—पर हम सबका भारत है एक!
शहीदों का संदेश—सबसे ऊपर भारत एक!
2 महीने पहले
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