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मनुष्य होने की शर्त

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैंने पूछा एक दिन
        
                                                    
                            
अपने ही भीतर बैठे मनुष्य से—
“मनुष्य होने की
आख़िर शर्त क्या है?”
उसने कहा—
न माथे पर कोई तिलक चाहिए,
न हाथ में कोई धर्मग्रंथ,
न ऊँचा कुल,
न ऊँचा सिंहासन,
न नाम के आगे कोई बड़ा संबोधन।
बस इतना करना—
जब किसी की आँख में पानी हो,
तो अपनी आँख सूखी मत रखना;
जब कोई राह में गिर जाए,
तो यह मत पूछना—
“किसका है?”
बस हाथ बढ़ा देना।
जब किसी की थाली में
एक निवाला कम हो,
तो अपनी थाली का
एक निवाला छोटा कर देना;
जब किसी के घर में
अँधेरा उतर आए,
तो अपने दीपक की लौ
थोड़ी-सी उधर कर देना।
मैंने कहा—
“इतना ही?”
वह मुस्कुराया और बोला—
“नहीं…
सबसे कठिन काम अभी बाकी है।”
जब तुम्हारे पास
किसी को चोट पहुँचाने की शक्ति हो,
तब उसे क्षमा कर देना।
जब तुम्हारे पास
किसी को नीचा दिखाने का अवसर हो,
तब उसका हाथ थाम लेना।
जब तुम्हारी जीत
किसी दूसरे की हार पर टिकी हो,
तब ऐसी जीत से
एक कदम पीछे हट जाना।
और जब तुम्हें लगे
कि तुम बहुत बड़े हो गए हो—
तब किसी माँ के पैरों के पास
चुपचाप बैठ जाना।
क्योंकि—
मनुष्य होना
शरीर की बनावट नहीं,
मन की तैयारी है;
मनुष्य होना
जन्म की घटना नहीं,
हर दिन चुनी हुई जिम्मेदारी है।
जिस दिन
तुम किसी अपरिचित के दुःख को
अपना दुःख समझ लोगे,
उस दिन तुम्हारे भीतर
एक नया मनुष्य जन्म लेगा।
जिस दिन
किसी की सफलता देखकर
तुम्हारे भीतर ईर्ष्या नहीं,
आशीष उठेगी—
समझना,
तुम थोड़ा और मनुष्य हुए।
जिस दिन
तुम्हारे पास बदला लेने का कारण हो
और तुम प्रेम चुन लो—
उस दिन
तुमने स्वयं पर विजय पा ली।
दुनिया में
बहुत लोग जीतते हैं युद्ध,
बहुत लोग जीतते हैं चुनाव,
बहुत लोग जीतते हैं धन,
बहुत लोग जीतते हैं सिंहासन—
पर सबसे बड़ी विजय
उसकी है
जो अपने भीतर के
अहंकार को हरा दे।
क्योंकि
ईंटों से महल बनाना आसान है,
पर किसी टूटे हुए मन में
विश्वास का घर बनाना कठिन है।
शब्दों से उपदेश देना आसान है,
पर किसी के दुःख में
बिना शब्दों के खड़ा रहना कठिन है।
पूजा में सिर झुकाना आसान है,
पर किसी भूखे के आगे
अपनी थाली झुका देना—
यही असली आराधना है।
और शायद इसीलिए
ईश्वर ने मनुष्य को
सबसे पहले मन दिया,
फिर बुद्धि दी,
फिर वाणी दी—
ताकि वह
बोलने से पहले महसूस करे,
सोचने से पहले समझे,
और पाने से पहले
देना सीखे।
तो आओ—
आज कोई बड़ा संकल्प नहीं लेते,
बस एक छोटा-सा काम करें—
किसी अनजान चेहरे पर
बिना कारण मुस्कान रख दें,
किसी थके हुए कंधे पर
अपना हाथ रख दें,
किसी रूठे हुए अपने को
पहले पुकार लें,
और किसी दुखी मन से कह दें—
“तुम अकेले नहीं हो,
मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
शायद यही वह क्षण होगा
जब धरती पर
एक और मनुष्य जन्म लेगा।
और जब कभी
हमसे हमारा परिचय पूछा जाए,
तो पद मत बताना,
धन मत गिनाना,
कुल मत सुनाना—
बस इतना कहना—
“मैंने किसी की राह से
एक काँटा हटाया था,
किसी के अँधेरे में
एक दीप जलाया था,
किसी के आँसू को
अपने आँचल में समेटा था,
और किसी टूटे हुए मन से
कहा था—
‘हिम्मत रखो,
अभी सब खत्म नहीं हुआ।’”
यदि इतना कह सको—
तो समझना,
तुमने केवल जीवन नहीं जिया…
तुमने
मनुष्य होने की
शर्त पूरी की है।
2 महीने पहले
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