मैं विधि का सजग प्रहरी हूँ, सत्य-पथ का रखवाला हूँ,
अन्यायों के घोर तमस में, न्याय-दीप की ज्वाला हूँ।
शब्द नहीं केवल लिखता हूँ, दायित्वों का निर्वाह हूँ,
संविधान की पावन गरिमा का जीवंत सदा प्रवाह हूँ।
कानूनों की सूक्ष्म व्याख्या, मेरा नित्य तपो-व्रत है,
धर्म नहीं पक्षपात कभी, न्याय ही मेरा प्रण है।
जहाँ छलों के जाल बिछे हों, वहाँ विवेक का शस्त्र बनूँ,
सत्य, नीति और न्याय-पथ का अडिग, अमिट मैं रथ बनूँ।
वाणी में हो शिष्ट विवेक, तर्कों में हो तेज अपार,
लेखनी मेरी धर्मदण्ड-सी करती सत्य का सत्कार।
संकट, भय या लोभ न डिगाएँ, अटल रहे विश्वास सदा,
कर्तव्य-पथ पर बढ़ता जाऊँ, यही रहे अभिलाषा सदा।
हर निर्णय में नीति झलके, हर मत में हो लोक-हित,
न्याय सुरक्षित रहे सभी का, यही हृदय की शुभ परिणति।
मैं केवल अधिकारी नहीं, उत्तरदायित्व महान हूँ,
विधि, नीति और सत्य-मार्ग का विनम्र साधक इंसान हूँ।
जब तक प्राणों में स्पंदन है, रहेगा मेरा यह उद्घोष—
"सत्यं वद, धर्मं चर" ही जीवन का अमर सन्तोष।
न्याय, सत्य और कर्तव्य-पथ पर अडिग रहे मेरा सम्मान,
ऐसा हो हर विधि-अधिकारी का गौरवमय जीवन-गान।