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हिंदी: अमर वाग्धारा एक संस्कृति की संजीवनी

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काल-पुरुष के भाल पर अंकित, जो शाश्वत अनुज्ञा है,
        
                                                    
                            
चेतना की गूढ़ अनुभूतियों की, जो पावन संज्ञा है।
संस्कृत के उत्तुंग शिखरों से, जो रस-निर्झर बनकर फूटी,
जन-मन के उर्वर प्रांगण में, बनकर संजीवनी छूटी।।

अपभ्रंश की कठिन शिलाओं को, सहज भाव से भेद चली,
काव्य-व्योम में नक्षत्रों-सी, नव्य कांति बिखेर चली।
तुलसी के मानस का दर्शन, सूर के पदों की सुरभित तान,
कबीर की रचनात्मक साखी, रसखान का अनुपम समर्पण-गान।।

यह भाषा नहीं है केवल ,शब्दों का संघात नहीं बस,
यह भारतीय आत्म चेतना की, कोई साधारण बात नहीं।
इसमें निराला का महाप्राण, दिनकर की हुंकार बसे,
पंत की सुकुमार कल्पना, महादेवी का जो अश्रु हँसे।।

तत्सम की गरिमा से मंडित, तद्भव की सहज तरंग लिए,
विविध बोलियों के माणिक्य, अपने अंतर में संग लिए।
ऋजु इतनी कि अबोध बाहुक भी, सहज-भाव से बोल सके,
गंभीर इतनी कि अपने अंतर में महासिंधु को तोल सके।।

अंचल में हर प्रांतीय बोली को ,जो ममता-सा दुलार दे,
मातृ-रूपा वह पावन वाणी, जग को अनुपम प्यार दे।
प्राची से प्रतीची तक फैली, उत्तर से दक्षिण की ओर,
अनेकता में एकता पिरोती, जो भारत की स्वर्णिम डोरी।।

स्पंदन जो निज राष्ट्र-हृदय का, जन-गण-मन की चेतना महान,
यह हिंदी ही तो है हमारी संस्कृति, भारत-भू का जो है स्वाभिमान।
शत-शत नमन इस पावन स्वर को, श्रद्धा के पुष्प चढ़ाते हैं,
इस अमर वाग्धारा के सम्मुख, हम अपना शीश झुकाते हैं।।
9 घंटे पहले
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