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अभिषेक-विभा का प्रेम

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंगल-कलश सजे आँगन में, बरसे सुख की धार,
        
                                                    
                            
अभिषेक-विभा का प्रेम रहे, युग-युग तक साकार।

सात फेरे, सातों वचन बनें, जीवन का आधार,
अटूट रहे यह प्रेम-सूत्र, जन्म-जन्म का प्यार।

धूप मिले या छाँव घिरे, आए सुख या पीड़ा,
एक-दूजे का हाथ थामकर जीतो जीवन-क्रीड़ा।

विभा बने गृह-सरिता शीतल, अभिषेक हिम-सा धीर,
प्रेम, त्याग, विश्वास महकाएँ दाम्पत्य की तक़दीर।

हेमाक्ष-हेमाक्षी की मधुर हँसी महकाए घर-द्वार,
यथार्थ, निखिल, मयन, ऋषभ, विहान बढ़ाएँ कुल-श्रृंगार।

ज्ञान, विनय, सद्गुण से शोभित हो जीवन का विस्तार,
कीर्ति-पताका फहरे उनकी अम्बर के उस पार।

पिता सत्यनारायण दत्त का अमृतमय आशीष मिले,
माता सरोज की ममता से जीवन-उपवन नित खिले।

दीपक दाधीच का स्नेह रहे, अखिल का शुभ आशीर्वाद,
मंजू, राखी का अपनापन रखे सदा परिवार आबाद।

बहन वर्षा के स्नेह-सुमन से महके हर त्योहार,
विजेन्द्र संग रिश्तों की डोरी रहे अटल अपार।

ससुर ओमप्रकाश दाधीच का मंगलमय आशीष मिले,
माॅ रूपी सासू प्रेमलता की ममता से हर ऋतु नव-वसंत खिले।

साला आशीष संग सहलज अनुराधा का स्नेह बढ़ाए प्रेम-प्रकाश,
अंश बने कुलदीपक उज्ज्वल, बढ़े यश का आकाश।

छोटा सा आशु का स्नेह सदा जीवन में नव उत्साह जगाए,
हर संकट में आत्मीय बन साथ सदा निभाए।

सुमन बहना की स्नेह-सुधा, साडू रखता शुभ मान,
दोनों कुल के प्रेम-पुष्प से महके हिन्दुस्तान।

पीहर और ससुराल सदा बन प्रेम-सुधा का द्वार,
दो कुल मिलकर रचें निरंतर स्नेहिल नव-संसार।

बंधु-बांधव सब प्रेम-सुधा से भर दें जीवन-पात्र,
एकसूत्र में बँधा रहे यह पावन कुल-चरित्र।

कुलदेवी माँ जीण भवानी रखें सदा वरद-हाथ,
दधिमती माता आलोकित करें जीवन की हर राह।

संकट, शोक, विघ्न सभी हर लें अपनी करुणा-छाँव,
अक्षय रखें कुल की गरिमा, यश, वैभव और ठाँव।

माँ लक्ष्मी का नित्य निवास हो, श्रीहरि का हो नाम,
शिव-पार्वती की असीम कृपा से सिद्ध हों सब काम।

सरस्वती का ज्ञान मिले, गणपति हरें विघ्नभार,
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से भर जाए जीवन-द्वार।

यश, वैभव, आरोग्य, कीर्ति से भर जाए हर द्वार,
हर वर्षगाँठ नव-वसंत बन आए बारंबार।

प्रेम-वटवृक्ष सदा फलता-फूलता, बढ़ता रहे महान,
सौ-सौ वर्षों तक गूँज उठे इस कुल का यशगान।

ईश्वर से बस यही विनय है—रहे अधरों पर मुस्कान,
अभिषेक-विभा का पावन बंधन बने जग की पहचान।

शत-शत मंगलकामनाएँ, शत-शत बार प्रणाम,
जीण भवानी, दधिमती माता रखें सदा शुभ धाम।

सुख, समृद्धि, प्रेम और यश से ऊँचा हो परिवार का नाम,
अभिषेक-विभा का दाम्पत्य अमर रहे—यही हमारा प्रणाम।
3 महीने पहले
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