सुबह की सैर थी।
फ़ोन पर चलती बातों के बीच
अचानक नज़र ठहर गई।
तीन बच्चे कचरे के ढेर से चुन रहे थे—
"Happy Birthday" के रंगीन अक्षर,
कुछ गुब्बारे, कुछ मुरझाए सजावटी फूल।
यक़ीनन, बीती रात किसी ने जन्मदिन मनाया होगा।
केक कटा होगा,तस्वीरें खिंची होंगी, हँसी देर तक गूँजी होगी।
फिर रात के उतरते ही वही हँसी, वही रंग,
वही सजावट कचरा घोषित कर दी गई।
लेकिन उन बच्चों ने कचरा नहीं देखा।
उन्होंने देखा अपने घर की दीवार पर
टँगने वाला एक छोटा-सा उत्सव,
जिसे वे कई दिनों तक जी सकेंगे।
जो किसी के लिए सिर्फ़ एक रात की सजावट थी,
वह उनके लिए कई सुबहों की मुस्कान थी।
वे चीज़ें नहीं, खुशियाँ बटोर रहे थे।
तभी समझ आया
कचरे का भी एक पुनर्जन्म होता है।
जहाँ हमारी खुशियाँ
डस्टबिन में दम तोड़ देती हैं,
वहीं से किसी और के सपने
साँस लेना शुरू करते हैं।
शायद संपन्नता
चीज़ों की उम्र छोटी कर देती है,
और अभाव उन्हीं चीज़ों में
जीवन की सबसे लंबी मुस्कान खोज लेता है।
- : हेमाषण अंकित