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किस तरह की बात

Akash Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक बात जो ना जाने कितने घर को होती जा रही है
        
                                                    
                            
आँखे दुख रही मगर एकटक उन्हें ही देखे जा रही है

पत्थर पिघल रहे उसके एक छूअन से
वो लड़की दिन ब दिन हसीन होती जा रही हैं

हम गरीबों से बात तक नहीं करती
वो अपने आप से भी अमीर होती जा रही है

किसे पड़ी है यहाँ सालिखे से रहने की
दुनिया तो हर रोज बिगड़ती जा रही है

कहे को कैसे उसके अनसुना कर दे
चूड़ी कान में मेरे वो खनखनाकाती जा रही है

ये नाखुश ही रहेंगे तुम्हे बुलंदियों पर देख के
जो ज़रा सी जीत पर पीठ थपथपाई जा रही है

रात काफ़ी हो गई है गौतम और तुम
ये किस तरह की बात बताई जा रही है

- ऐ. के. गौतम
6 घंटे पहले
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