एक बात जो ना जाने कितने घर को होती जा रही है
आँखे दुख रही मगर एकटक उन्हें ही देखे जा रही है
पत्थर पिघल रहे उसके एक छूअन से
वो लड़की दिन ब दिन हसीन होती जा रही हैं
हम गरीबों से बात तक नहीं करती
वो अपने आप से भी अमीर होती जा रही है
किसे पड़ी है यहाँ सालिखे से रहने की
दुनिया तो हर रोज बिगड़ती जा रही है
कहे को कैसे उसके अनसुना कर दे
चूड़ी कान में मेरे वो खनखनाकाती जा रही है
ये नाखुश ही रहेंगे तुम्हे बुलंदियों पर देख के
जो ज़रा सी जीत पर पीठ थपथपाई जा रही है
रात काफ़ी हो गई है गौतम और तुम
ये किस तरह की बात बताई जा रही है
- ऐ. के. गौतम
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