आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

किस तरह की बात

                
                                                         
                            एक बात जो ना जाने कितने घर को होती जा रही है
                                                                 
                            
आँखे दुख रही मगर एकटक उन्हें ही देखे जा रही है

पत्थर पिघल रहे उसके एक छूअन से
वो लड़की दिन ब दिन हसीन होती जा रही हैं

हम गरीबों से बात तक नहीं करती
वो अपने आप से भी अमीर होती जा रही है

किसे पड़ी है यहाँ सालिखे से रहने की
दुनिया तो हर रोज बिगड़ती जा रही है

कहे को कैसे उसके अनसुना कर दे
चूड़ी कान में मेरे वो खनखनाकाती जा रही है

ये नाखुश ही रहेंगे तुम्हे बुलंदियों पर देख के
जो ज़रा सी जीत पर पीठ थपथपाई जा रही है

रात काफ़ी हो गई है गौतम और तुम
ये किस तरह की बात बताई जा रही है

- ऐ. के. गौतम
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर