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अपनी क़िस्मत

Akash Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम बिखरे तो फिर समेटे में ना आये
        
                                                    
                            
जैसे रेत मुट्ठी में ना आये
कैसे कह दूं उसको मै नहीं जानता
जो शख्स रोज़ ख़त ओ खयालात में आये
रूठ कर कोई उनसे कहा तक जाए
ये उड़ती मिट्टी लौटकर ज़मीन पर ही आये
ये हवा शहर का शहर तबाह कर देगी
खुदा करे ये मेरी तन्हाईयों में आ जाये
जिस रोज़ उसकी गली जाऊं
काश मेरे वो सामने आ जाएं
थक गया हु भटकते भटकते
अब तो सही रस्ते पर आ जाए
तुम उस शख़्स की इतनी तमन्ना कैसे कर लेते हो गौतम
अपनी नज़र में न चाहे जो तुम्हे अपनी क़िस्मत में क्यों लाये
 -ऐ .के .गौतम
3 घंटे पहले
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Sanjai kumar

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