हम बिखरे तो फिर समेटे में ना आये
जैसे रेत मुट्ठी में ना आये
कैसे कह दूं उसको मै नहीं जानता
जो शख्स रोज़ ख़त ओ खयालात में आये
रूठ कर कोई उनसे कहा तक जाए
ये उड़ती मिट्टी लौटकर ज़मीन पर ही आये
ये हवा शहर का शहर तबाह कर देगी
खुदा करे ये मेरी तन्हाईयों में आ जाये
जिस रोज़ उसकी गली जाऊं
काश मेरे वो सामने आ जाएं
थक गया हु भटकते भटकते
अब तो सही रस्ते पर आ जाए
तुम उस शख़्स की इतनी तमन्ना कैसे कर लेते हो गौतम
अपनी नज़र में न चाहे जो तुम्हे अपनी क़िस्मत में क्यों लाये
-ऐ .के .गौतम