बादलों से एक सवाल
बादलों की ओर देखती हूँ,
मन में एक सवाल उठता है—
क्या हम सचमुच सुरक्षित हैं?
क्या हमारे बादल आज भी
पहले जैसी शुद्ध हवा,
जीवन की साँस और प्रकृति का स्नेह
हमें दे पा रहे हैं?
मन में एक संघर्ष-सा रहता है,
एक अनकही बेचैनी पलती है।
क्या हम पहले की तरह
खुलकर जी पा रहे हैं?
बादल तो आज भी चुप हैं,
दिन-रात अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।
पर क्या हम अपना कर्तव्य निभा रहे हैं?
क्या हम अपनी धरती को सुरक्षित रख पा रहे हैं?
धूल, धुएँ और प्रदूषण की चादर ओढ़ाकर
हमने बादलों की उजली रौनक छिपा दी है।
प्रकृति हमें हर दिन जीवन देती है,
पर क्या हम उसे जीने का अधिकार दे रहे हैं?
आओ, एक संकल्प लें—
धरती को फिर से हरा-भरा बनाएँ,
हवा को स्वच्छ करें,
ताकि बादल फिर मुस्कुराएँ
और आने वाली पीढ़ियाँ
खुली साँसों के साथ जीवन जी सकें।