कौन जन्मता है पाप लिए?
कौन पुण्यों का भार उठाता है?
धरती पर आने वाला हर मानव
बस एक निष्कलुष प्रभात कहलाता है।
न उसके ललाट पर दोष लिखा,
न पुण्य का कोई मान लिए;
वह तो भीगी माटी-सा आता,
अनगिन रूपों की जान लिए।
फिर समय हथेली थामे चलता,
परिस्थितियाँ आकार गढ़ें;
स्नेह मिले तो फूल-सा महके,
घाव मिलें तो शूल चढ़ें।
जिसने ममता की छाँव पाई,
उसने जग में दीप जलाए;
जिसने केवल तिरस्कार सहा,
उसने भीतर शूल उगाए।
दोष कहाँ उस जन्मे मन का,
जो निष्कलुष अवतार बना?
शिल्पी जैसे हाथ मिले हों,
वैसा ही आकार बना।
अंत में जग ने नाम दिए—
किसी को संत, किसी को पाप;
पुस्तक सबकी एक-सी थी,
भिन्न-भिन्न थे लिखने वाले हाथ।