विज्ञापन

मुझे न याद रखा जाएं, अजय पोद्दार 'अनमोल'

अजय पोद्दार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं चाहता हूं मुझे भूलते रहे,
        
                                                    
                            
उन तमाम मंचों से,
धन्यवाद ज्ञापन करते समय,
किसी विशेष कविता को पढ़ते समय,
किसी मैदान में आगे बढ़ते समय,
कोई नया पहलू गढ़ते समय,
ऊँचाइयों पर चढ़ते समय,
पुरस्कार लेकर उतरते समय,
अपने टोले के निर्माण में,
मत लेना कभी मुझे संज्ञान में,
मैं नहीं चाहता खबर होना,
किसी मादकता का असर होना,
एक समय के बाद जो कट जाएं,
चेहरों पर आकर जो बंट जाएं,
किसी बादल सा जो छंट जाएं,
किसी संदूक में जो अट जाएं,
मेरी उपस्थिति को रहने देना शून्य,
मुझे रहने देना डायरी का सूखा फूल,
किसी गुलदस्ते का गौरव मत बनाना,
किसी सुगंधी का सौरभ मत बनाना,
किसी भाषण के टुकड़े में,
किसी गीत के मुखड़े में,
अखबार के पृष्ठों पर,
सम्मान की लिस्टों पर,
रहे मेरा नाम विलुप्त,
जहां हो सभी आदर युक्त,
किसी छद्म वेश में आड़ में,
किसी जलती बत्ती की झाड़ में,
मैं चाहता हूं मुझे याद न रखा जाएं,
मेरे लिए कोई स्थान न रखा जाएं,
मैं रहकर भी न रहूं जहां,
मेरा होना बस एक ताली हो जहां,
किसी किनारे पर कुर्सी खाली हो जहां,
मैं चाहता हूं मुझे भुला दिया जाएं,
किसी फटी कमीज सा झुला दिया जाएं,
जिसने ढकी थी देह उन दिनों,
जिन दिनों सिक्के आवाज करते थे,
नोट के खड़खड़ाते त्यौहार नहीं थे,
इतने आधुनिक पहचान नहीं थे,
जिसके होने का न आभास हो,
न होने का ही कोई आगाज हो,
मंच के ठीक सामने न देना कभी स्थान,
इससे बढ़ सकती है मेरी झूठी शान,
बहक सकता है मेरा कुत्सित अभिमान,
खो सकता है मेरे कुछ न होने का भान,
हो सकता है फिर हो बस मेरा गान,
गुंज उठे मेरे नाम से सभागार,
मौन पड़ जाएं सभी हाहाकार,
मत बनने देना मुझे कभी विचार,
कहीं मैं मिश्रित न हो जाऊं दवा में,
मत करना मेरी चर्चा किसी सभा में,
यदि खिल उठा मैं कभी प्रभा में,
यदि विचरने लगा कभी हवा में,
यदि मुखरित हुआ कभी आभा में,
यदि फैल गया कभी अनुभा में,
मुझे कभी मत बनाना क्लांति का प्रतीक,
कभी मत लाना भ्रांति के समीप,
कभी बना तो बन जाऊंगा पथिक का उज्वल रूप,
कभी बना तो बन जाऊंगा कांति स्वरुप,
कभी बन पाऊं तो बनूँगा घास के लिए धूप,
कभी साहित्यकार न बनने के क्रम में,
यदि बन पाया तो बनूँगा अन्वेषक की भूख,
यदि बन पाया कुछ तो बनना चाहूंगा कूप,
जिसे भरने के लिए होगी वर्षा,
बाढ़ का पानी जिसमें जाएगा सूख,
कुछ बचा पाया तो बचा लूंगा कुछ प्राण,
बन जाऊंगा कोई छावदार वृक्ष,
पक्षियों को मिलेगा जहां त्राण,
मानव पशुओं में नहीं होगा जहां कोई भेद,
प्यास बुझा सकूँ किए बिना कोई खेद,
कभी मत कराना परिचित किसी से,
भारी मन से मत बढ़ाना कभी आगे मुझे,
न आगे की भूख न पीछे की चाह है,
यात्रियों के पास किराया न हो पर राह है,
न किसी उम्मीद न संशय में रखियेगा,
मुझे नहीं किसी पर्चे में रखियेगा,
फल खाकर भी जी लेते है हंसकर,
न सोचिएगा न की खर्चे में रखियेगा,
प्रार्थना सा हूं कपूर सा उड़ता फिरूंगा,
ये न सोचिएगा कभी बस्ते में रखियेगा,
न बंजारे सा जीवन न महलों का प्रयास है,
मुझे मिट्टी से बने घर का भी अभ्यास है,
जो सबके लिए है अनिवार्य मेरे लिए अनायास है,
मैं एक अक्षर मात्र हूं मुझे इस बात का एहसास है,
वर्णमाला में न रहूंगा तब तो बात होगी,
जब मुझे ढूंढने की आरंभिक शुरुवात होगी,
मेरे लिए न बनाना राह दया की,
न किसी उम्मीद का दामन ही सजाना,
जिनको लेकर थे चले,
जिनसे थे कभी दीप जले,
उन्हीं का बोलबाला होना चाहिए,
मुझे निकालने के लिए दरवाजे का जो कोना चाहिए,
मैं स्वयं प्रस्थान करूंगा चिंतित नहीं होना चाहिए,
मेरे लिए रत्ती भर जगह कहीं सिंचित नहीं होना चाहिए,
न किसी प्रलोभन में फंस सकता हूं,
न किसी प्रतिज्ञा में बंध सकता हूं,
मत करना कभी कोई बात मेरी,
न ही किसी मौके पर प्रोत्साहित करना,
मेरे कारण कुछ लोग छूट न जाएं,
जिनके होने से मंच है,
जिनका होना ही मंच है,
मैं चाहता मुझे मिटाने का प्रयास हो,
भीड़ से हटाने का प्रयास को,
सबसे अलग रखने का अभ्यास हो,
मुझे अकेला देख पाने का अभ्यास हो,
नहीं करना ऐसा काम किसी भूल की तरह,
बस झाड़ देना धीरे से धूल की तरह,
मैं उगना चाहता हूं धतूरे के फूल की तरह,
उगना चाहता हूं कंदमूल कि तरह,

 
10 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12614 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile

User

29 कविताएं

View Profile

Jeewan Singh

97 कविताएं

View Profile

Mamta Tiwari

639 कविताएं

View Profile