वफ़ादार होना
ज़ुबान से कह देने भर का नाम नहीं,
यह तो वह राह है
जहाँ कदम-कदम पर
इंसान को अपने ही चरित्र की
परीक्षा देनी पड़ती है।
दूसरों के साथ वफ़ादारी निभाना
फिर भी आसान है,
मगर सबसे कठिन है—
ख़ुद के साथ वफ़ादार रहना।
क्योंकि ख़ुद से किया हुआ विश्वास
न परिस्थितियाँ देखता है,
न लाभ-हानि,
और न ही किसी के बदल जाने का डर।
इसलिए जब कभी कोई तुमसे कहे—
“मैं तुम्हारे प्रति वफ़ादार हूँ…”
तो उसकी बात पर
तुरंत विश्वास मत करना।
बस हल्का-सा मुस्कुराना,
उसे उसके शब्दों के साथ छोड़ देना
और अपनी राह पर आगे बढ़ जाना।
क्योंकि वफ़ादारी
कहने की चीज़ नहीं,
वक़्त आने पर निभाने की चीज़ है।
मीठे शब्दों से
किसी की नीयत का पता नहीं चलता,
क्योंकि हर मधुर शब्द
मधु जितना शुद्ध और मीठा हो,
यह ज़रूरी नहीं।
इस दुनिया में
हर कोई शिकारी बनना चाहता है,
क्योंकि शिकार करने में
अपनी ताक़त का एहसास होता है।
मगर याद रखना—
जो स्वयं शिकारी बनना चाहता है,
वही किसी और का शिकार बनना
सबसे कम स्वीकार करता है।
यही दुनिया का दस्तूर है—
लोग वफ़ादारी की बातें बहुत करते हैं,
मगर जब वफ़ादारी की कीमत चुकाने का समय आता है,
तो अक्सर
सबसे पहले वही बदलते हैं,
जो सबसे पहले वफ़ादारी का दावा करते हैं।