तुम कहाँ गए…?
कैसे गए…?
किस ओर चले गए…?
इसकी मुझे
आज तक कोई ख़बर नहीं।
अगर तुम्हें खोजने निकलूँ भी…
तो जाऊँ किस ओर?
मेरे लिए
न इधर कोई रास्ता बचा है,
न उधर कोई मंज़िल दिखाई देती है।
ऐ हवा…
अब तू ही बता—
मेरा हमदम…
मेरा हमसफ़र…
आख़िर कहाँ है?
क्या वह लौटकर आएगा?
क्या वह मुझसे मिलने आएगा?
क्या वह मुझे अपने साथ ले जाएगा?
उस जहाँ में…
जिसे हमने कभी
अपना सारा जहाँ कहा था।
या फिर…
वह सब केवल
एक अधूरा वादा था?
और यदि ऐसा था…
तो मुझे अपने सपनों में बसाया ही क्यों?
मेरे दिल में
अपनी जगह बनाई ही क्यों?
मेरी धड़कनों को
अपने नाम से जोड़ा ही क्यों?