आज हृदय के विस्पंदों से इक मीठी आवाज उठी
कुछ ने मुझे झिंझोर दिया कुछ से हल्की मुस्कान उठी
कुछ भाप के जैसे लगते थे कुछ बोझ थे मेरे सीने पे
कुछ ने था मुझको दुत्कारा कुछ खुश थे मरकर जीने पे
फिर इक दिन जीवन के पन्नों पर इक कोरा कागज छोड़ दिया
उसे लिखता हूँ उसे भरता हूँ पर अब वो बढ़ता जाता हैं
जैसे किसी हवसी आदम के मुँह को लहू लग जाता
ये शायद कोई तरक्की थी जिसे था मैंने ही जन्म दिया
या दिल की थी कोई बेचैनी जिसे कविता का प्रारूप दिया
इक दिल की टीस मिटाने में सारा जीवन लग जाता है
फिर कविताएँ लिखते लिखते कोई कवि मर जाता है
तुम आसान समझते हो कोई भी सफर आसान नहीं
तुम्हें पता है पत्थर को पानी की इक बूँद ने काट दिया
यें ऊँचे ऊँचे पर्वत से जो नदियाँ बहती रहती हैं
सुनना इनको दिल से कभी ये आप से भी कुछ कहती हैं
सतत समर्पण करने से मुश्किल का हल मिल जाता है
प्यासे को सूखी रेत में भी गंगाजल मिल जाता है
तो जोर लगाओ एक बार पूरे मन को अर्पण कर दो
अपनी ताकत पहचानों तुम तो जीवन को संदल कर दो
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