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आज हृदय के विस्पंदों से इक मीठी आवाज उठी

Ajay Upadhyay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज हृदय के विस्पंदों से इक मीठी आवाज उठी
        
                                                    
                            
कुछ ने मुझे झिंझोर दिया कुछ से हल्की मुस्कान उठी
कुछ भाप के जैसे लगते थे कुछ बोझ थे मेरे सीने पे
कुछ ने था मुझको दुत्कारा कुछ खुश थे मरकर जीने पे
फिर इक दिन जीवन के पन्नों पर इक कोरा कागज छोड़ दिया
उसे लिखता हूँ उसे भरता हूँ पर अब वो बढ़ता जाता हैं
जैसे किसी हवसी आदम के मुँह को लहू लग जाता
ये शायद कोई तरक्की थी जिसे था मैंने ही जन्म दिया
या दिल की थी कोई बेचैनी जिसे कविता का प्रारूप दिया
इक दिल की टीस मिटाने में सारा जीवन लग जाता है
फिर कविताएँ लिखते लिखते कोई कवि मर जाता है
तुम आसान समझते हो कोई भी सफर आसान नहीं
तुम्हें पता है पत्थर को पानी की इक बूँद ने काट दिया
यें ऊँचे ऊँचे पर्वत से जो नदियाँ बहती रहती हैं
सुनना इनको दिल से कभी ये आप से भी कुछ कहती हैं
सतत समर्पण करने से मुश्किल का हल मिल जाता है
प्यासे को सूखी रेत में भी गंगाजल मिल जाता है
तो जोर लगाओ एक बार पूरे मन को अर्पण कर दो
अपनी ताकत पहचानों तुम तो जीवन को संदल कर दो
 
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4 वर्ष पहले
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