अब तो क़ातिल हूँ ... मैं ख़ुद ही हर फ़साने का।
मुझको अहसास नहीं... ख़ुद के भी मर जाने का।।
अब ना शिकवा है ... किसी को मेरी निगाहों से...
मैं तो मुजरिम हूँ कोई... बीते हुए ज़माने का।।।
मुद्दतों बाद भी ... जैसे निशाँ कोई बाक़ी है...
ज़ख़्म हासिल है मुझे... अब भी उस निशाने का।।
इस कदर डूबा हुआ हूँ .. मैं ग़मों की स्याही में..
हौसला मुझमें नहीं... रोशनी जुटाने का।।
सहेज रक्खा है जिन्हें... दिल के किसी कोने में...
दिल नहीं करता है.. उन यादों की फिर बुलाने का।।
तमन्नाओं की ना पूछो ‘अजय’... अब बलन्दी वो नहीं...
है मुश्किल काम बहुत... चाँदनी को पाने का।।