एक चिड़िया को मैंने पाला ,
उसे चुगने को दाना डाला !
टुकुर-टुकुर वह देख रही थी ,
बेबस सी मुझे घूर रही थी !
मैंने पूछा क्यों रूठी हो चिड़िया रानी ?
क्यों तज ती हो दाना पानी ?
वो बोली–तुम ठहरे हो ठगी प्राणी ,
तुम्हारी विस्मय भरी सुनी कहानी !
दाना देकर हमें ललचाते ,
प्यारी बातें कर हमें लुभाते ,
न जाने किस फंदे में हमें फंसाते ?
अवसर पाकर , हमें चट कर जाते !
– अजय शोभने.