चेहरे पर लगे, इन काले रंगों को देखो,
छुप गए चेहरे के सारे दागों को देखो।
लगा लो नीले–पीले सारे रंगों को,
उन्हीं रंगों के पीछे से जमाने को देखो।
जाकर मिल लो अपने सारे पड़ोसियों से,
जिनसे बिगड़ गई थी कभी तुम्हारी बात।
घर में बने गुलगुले–गुजियों के सुगंध से
महका दो पड़ोसियों के मन और घर।
ठंडई की ठंडक से कर लो शीतल कलेजे को,
भांग घोंटकर बंधे से मन को जाने दो उड़।
ऐसे मौके बार बार इस हयात में नहीं आते,
खुशियाँ आई है द्वार पे, उन्हें आ जाने दो भीतर।
पेड़ पर चहकते चिड़ियों–पक्षियों को देखों,
आंगन में नाचते गाते बच्चों के उमंगों देखों।
लड़ते–झगड़ते उनके कोमल मन को देखों,
एक साथ फिर मिल बैठ खाती पंक्तियों को देखों।
आओ सब भूलकर खेले इस रंगों के त्यौहार को,
भूल जाएं आज अपने बीच की पुरानी दरारों को।
बनकर आंगन में खेलते कोमल मन बच्चों की तरह,
रंगों में घुल जाएं..................,
एक दूसरे में मिलते सागर–नदियों की तरह।
–अजय नायक ‘वशिष्ठ’