खेल रहे हैं दादा संग पोता
खेल रही है दादी संग पोती
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहे हैं नाना नानी संग नातिन नाती
खेल रहे हैं राजा संग रंक
खेल रहे हैं साधु संग फकीर
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहे हैं रामलला संग अयोध्यावासी
खेल रहे हैं भौजी संग भइया
खेल रहे हैं देवर संग भौजी
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहे हैं हमारे लालू संग राबड़ी
खेल रहे हैं प्रकृति संग हम
खेल रहे हैं आग संग हम
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहा है प्रकृति हम सब के संग
खेल खेल में रंग गए सबके गाल
पता नहीं चल रहा कौन किसका बाल
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
काले पीले नीले सबकी हो गई एक जात
कहीं घिसी जा रही है भंगिया
कहीं बनाया जा रहा है पकौड़ा
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
सब मिलकर पी रहें हैं गुजिया संग ठंडाईया
ये एक ऐसा है त्योहार
सारे रंग एक ही बाल्टी में जाते हैं घुल
भर फागुन चढ़ता है ऐसा खुमार
चैता के लिए भरता है हुंकार