आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

होली एवम धूलिवंदन

                
                                                         
                            खेल रहे हैं दादा संग पोता
                                                                 
                            
खेल रही है दादी संग पोती
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहे हैं नाना नानी संग नातिन नाती

खेल रहे हैं राजा संग रंक
खेल रहे हैं साधु संग फकीर
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहे हैं रामलला संग अयोध्यावासी

खेल रहे हैं भौजी संग भइया
खेल रहे हैं देवर संग भौजी
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहे हैं हमारे लालू संग राबड़ी

खेल रहे हैं प्रकृति संग हम
खेल रहे हैं आग संग हम
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
खेल रहा है प्रकृति हम सब के संग

खेल खेल में रंग गए सबके गाल
पता नहीं चल रहा कौन किसका बाल
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
काले पीले नीले सबकी हो गई एक जात

कहीं घिसी जा रही है भंगिया
कहीं बनाया जा रहा है पकौड़ा
कुछ ऐसा चढ़ा है फागुन का खुमार
सब मिलकर पी रहें हैं गुजिया संग ठंडाईया

ये एक ऐसा है त्योहार
सारे रंग एक ही बाल्टी में जाते हैं घुल
भर फागुन चढ़ता है ऐसा खुमार
चैता के लिए भरता है हुंकार
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर