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जिस-जिस को जलना है और जलो

Ajay Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मकान जो बनाया मेरे पिता ने, तो लोग जलने लगे,
        
                                                    
                            
किया न किसी का अहित मैंने, फिर भी हितैषी घटने लगे।
ली जो हमने उच्च शिक्षा, तो आस्तीन के सांप पलने लगे,
सब जानकर जब किनारा किया, तो वो हर जगह निंदा करने लगे।
हमारा लक्ष्य तो कुछ और था, इसलिए हम उन्हें अनदेखा करने लगे।
मेहनत तो अभी जारी है मेरी, लोग सोचें हम कुछ कर नहीं रहे,
कामयाबी तो एक दिन आनी ही है, बस उसी दिन का हम इंतज़ार कर रहे।
इस ज़माने ने कब साथ दिया मेरा? फिर क्यों आज मुझसे उम्मीद कर रहे?
हम उनसे बात क्यों नहीं करते, बस यही सोचकर वो अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहे।
हम अपने फैसले खुद लेते हैं, लोग सोचें हम उनसे सलाह क्यों नहीं ले रहे,
जानते हैं हम कि वो छल ही देंगे, हम तो उन्हें दशकों से पहचान रहे।
हम तो बुद्ध के अनुयायी हैं, हमें फर्क नहीं पड़ता वो क्या सोच रहे,
जिस-जिस को जलना है, जलो और जलते ही रहो,
हम तो तुम्हारी इसी आग से अपना लक्ष्य रोशन कर रहे!
3 महीने पहले
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