शालीनता की, चादर थी
सौंदर्य भरी, उन आंखों में ।
फूट रही, मधुरता थी
हर अंग-अंग की, शाखों में ।
सूरत, भोली-भाली थी
मुस्कान जहां, ठहरती थी ।
वो याद रूमानी, थी कितनी
न रुकती थी, न जाती थी ।
मन में तरंगें, उठती थी
आती थी, चली जाती थी ।
लहरों की कश्ती, होठों पर
इठलाती थी, मुसकाती थी ।
यौवन फिर, कल-कल करता
साहिल तक आता, जाता था ।
हर बार लबों से, अपने वो
साहिल को, चूमता जाता था ।
लहराता था, आंचल जब
सागर की, ताल तरंगों पर ।
कितने मोती, आ जाते थे
मधुर मिलन के, संगम पर ।
-अजातशत्रु सिंह