मेरी कविता मुकम्मल हो गर
दुनिया भर के शोषित और उत्पीड़ित
हो किसी दिन किसी एक जगह पर इकठ्ठा
और बजा दे संघर्ष का बिगुल इन
रक्तपिपासु पूंजीपतियों के खिलाफ़ !
मेरी कविता मुकम्मल हो गर
दुनिया भर के शान्ति के मसीहा
हो किसी दिन , इकठ्ठा इस
धरती के किसी कोने में
और दे आखिरी चेतावनी इस सुन्दर जहाँ को
रक्त रंजित करने वाले खून खोरों को !
मेरी कविता मुकम्मल हो गर
दुनिया भर के मेहनतकश
इंसानों का सैलाब उमड़े
इस धरती पर इस लुटेरी
व्यवस्था के खिलाफ़ और
छीन ले इनसे तख्त ओ ताज !
मेरी कविता मुकम्मल हो गर
दुनिया भर के सभी समतावादी
हो इकठ्ठे एक दिन इन 'उच्च अहम' के शिकार
नस्ल भेड़ियों के खिलाफ लाने को बराबरी
करने को खत्म नस्लवाद, फासीवाद
और तमाम पाखण्ड इस जहान से!
- नवल किशोर "नवल"