महँगाई ओ बेरोजगारी की मार है दोस्त!
भूखा हो पेट, माँ उपवास समझ लेती है!
बेटा आया है फिर खाली हाथ बाजार से !
रखकर सिर पे हाथ अहसास समझ लेती है!
कोई सुने या नहीं सुने मेरे दुःख की कहानी!
माँ छोटी सी बात को उपन्यास समझ लेती है!
कोई क्या रुलाएगा उस माँ को नवल बता!
जो फाका कसी को अभ्यास समझ लेती है!
पल भर के लिए मैं घर से बाहर क्या गया!
वो छोटी सी यात्रा को वनवास समझ लेती है!
-नवल किशोर "नवल"