कविता: सत्य की पहचान
मुझे असत्य से उतना भय नहीं,
जितना उस घड़ी से है,
जब सत्य
निःसंकोच
हमारे द्वार पर आएगा,
और हम
अपने ही संशयों,
पूर्वाग्रहों
और स्वार्थ के अंधकार में
उसे पहचानने से इंकार कर देंगे।
सत्य कभी उद्घोष नहीं करता;
वह दीपशिखा की भाँति
निःशब्द जलता है।
कोलाहल तो प्रायः
अहंकार के प्रासादों में जन्म लेता है,
जहाँ विवेक नीलाम होता है,
तर्क बिकते हैं,
और निर्णय
तालियों की गूँज में लिख दिए जाते हैं।
मनुष्य का सबसे गहन अंधकार
रात्रि नहीं,
उसका अहं है;
जो खुली आँखों से भी
प्रकाश को स्वीकार नहीं करता।
हमने दर्पण बदलने में
पूरा जीवन बिता दिया।
किन्तु अपने चेहरे पर जमी
मिथ्या की धूल
झाड़ने का साहस
कभी नहीं जुटा सके।
हम दिशाओं को दोष देते रहे,
भाग्य को कोसते रहे,
समय से उलझते रहे;
पर एक क्षण के लिए भी
अपने भीतर उतरने का
साहस न कर सके।
सत्य कोई पर्वत नहीं,
जिसे विजय-पताका से मापा जाए;
वह तो अनन्त आकाश है,
जहाँ उड़ान
पंखों से नहीं,
विनम्रता से मिलती है।
जिस दिन
भीड़ का शोर
अंतरात्मा की मौन वाणी से
छोटा पड़ जाएगा,
उसी दिन
मनुष्य का वास्तविक जन्म होगा।
और यदि वह प्रभात आया,
जब सत्य पुनः विजयी हुआ,
तो मेरी यही प्रार्थना है,
हमारी दृष्टि पर
पूर्वाग्रह का कोई आवरण न रहे।
हम उसे पहचान सकें,
उसके सम्मुख
अपने अहं को झुका सकें,
और यह स्वीकार कर सकें,
सत्य प्रमाण का नहीं,
अनुभूति का विषय है;
और अनुभूति
उसी को प्राप्त होती है,
जिसने अपने भीतर के अंधकार को
स्वीकार करने का साहस किया हो।
मनुष्य की सबसे बड़ी साधना
सत्य को सिद्ध करना नहीं,
स्वयं को सत्य के योग्य बनाना है।
- डी. के. कनौजिया