विज्ञापन

नौकरी की जवानी

Adv DK Kanojiya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नौकरी की जवानी
        
                                                    
                            

सुबह अलार्म बजता है,
जवानी आँखें मलती है,
और आदमी उठकर
दफ़्तर की तरफ़ चल देता है।

जेब में लंच,
चेहरे पर मुस्कान,
और भीतर कहीं
एक सपना चुपचाप मर जाता है।

महीने के अंत में
सैलरी आती है,
कुछ बिलों में चली जाती है,
कुछ किस्तों में,
और थोड़ा-सा हिस्सा
अगले महीने तक जीने के लिए बच जाता है।

बॉस कहता है-“तुम हमारे परिवार का हिस्सा हो।”

और आदमी सोचता है,
परिवार में तो
अपने सपनों के लिए भी
थोड़ी जगह होती है!

हम दूसरों के कारोबार को
बड़ा करने में उम्र लगा देते हैं,
और अपने जीवन की दुकान पर
“बंद है” का बोर्ड लगा देते हैं।

प्रमोशन मिलता है,
कुर्सी बड़ी होती है,
केबिन बड़ा होता है,
लेकिन आदमी के भीतर
बचती जाती है
सिर्फ़ थकान।

फिर एक दिन
रिटायरमेंट का काग़ज़ हाथ में आता है।

तब समझ आता है,
जिस जवानी को
“करियर” कहा था,
वह तो कब की
किसी और की तरक्की में
खर्च हो चुकी है।

नौकरी बुरी नहीं है,
गुलामी भी हर नौकरी नहीं,
मगर उस नौकरी से डरना चाहिए
जो रोटी तो देती है,
पर जीने का वक़्त छीन लेती है।

कमाओ, मगर अपने लिए भी।
जिम्मेदारियाँ निभाओ, मगर सपनों को मत दफ़नाओ।
क्योंकि तनख़्वाह फिर आ जाएगी,
जवानी नहीं।
- डी. के. कनौजिया
56 मिनट पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all