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ग़ज़ल:मौन की पुकार

Adv DK Kanojiya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तख़्त की दीवार में अब दरार लगती है,
        
                                                    
                            
हवा कुछ बदली-बदली इस बार लगती है।

जो कल तलक शहर के ख़ुदा बने फिरते थे,
उन्हीं की आँखों में अब हार लगती है।

सच बोलने वालों को ख़ामोश कर दिया तुमने,
मगर ख़ामोशियों में भी पुकार लगती है।

महलों की रोशनी से नहीं मुल्क जगमगाता,
गरीब की झोपड़ी ही आधार लगती है।

जो बेच गए थे ज़मीर को चंद सिक्कों में,
उन्हें हर आईना अब तलवार लगती है।

लहू से सींचकर जिसने चमन सँवारा था,
उसी के हिस्से में क्यों बस ख़ार लगती है।

समय के न्याय से कोई बचा नहीं अब तक,
हर ऊँची शान भी लाचार लगती है।

कनौजिया, ये दौर सदा एक-सा नहीं रहता,
हर रात के बाद नई भोर तैयार लगती है।
-डी. के. कनौजिया
3 महीने पहले
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