इश्क़ का हिसाब
काश तुम Sin θ होते, मैं तुम्हारा Cos θ होता,
हमारा इश्क़ भी कोई मुकम्मल-सा हिसाब होता।
तुम x बनकर मेरी तक़दीर में आ जाते अगर,
मैं हर equation में तुम्हारा ही जवाब होता।
तुम मेरी constant, मैं तुम्हारा कोई variable,
बदलती उम्र में भी रिश्ता हमारा बे-मिसाल होता।
तुम्हारी आँखों तक जो जाती कोई limit मेरी,
तो x → तुम होते और दिल बे-हिसाब होता।
तुमसे दूरी का derivative निकालता अगर,
हर घटता हुआ लम्हा तुम्हारे नाम का अज़ाब होता।
मेरी साँसों को अगर integrate कर लेते तुम,
हर छोटी-सी धड़कन का तुम्हीं पूरा हिसाब होता।
तुम्हारी यादों का summation करता जो कभी,
तो हर term में तुम्हारा ही कोई ख़्वाब होता।
हम दो parallel lines की तरह मिल न सके शायद,
वरना हर intersection पे इश्क़ का गुलाब होता।
तुम π की तरह असीम, मैं कोई छोटा-सा दायरा,
तुम्हें समेटना चाहूँ तो कहाँ तक ये ख़्वाब होता।
कभी zero बनके तुम मेरी ख़ामोशी में आना,
मैं infinity बन जाता अगर तुम्हारा साथ होता।
हमारी मोहब्बत की probability चाहे कम थी,
मगर एक chance भी मिलता तो दिल कामयाब होता।
तुम्हारे बिन ये ज़िन्दगी एक undefined function है,
तुम मिल जाओ तो हर सवाल का जवाब होता।
और आख़िर में न कोई theorem, न कोई फ़साना,
बस इतना-सा गणित, इतना-सा इश्क़ हमारा:
Sin²θ + Cos²θ = 1
तुम मेरा Sin, मैं तुम्हारा Cos,
और दोनों मिल जाएँ तो
एक मुकम्मल “हम” होता।
- डी के कनौजिया