कविता – "एक कविता"
हर दिन बस कुछ पल ठहरो,
मन की धूल ज़रा-सी झाड़ो।
शब्दों की निर्मल सरिता में,
अपने अंतर्मन को उतारो।
जब जीवन का शोर बढ़े,
जब मन में चिंता घर कर जाए।
एक कविता धीमे-धीमे,
आशा का दीपक बन जाए।
कविता केवल छंद नहीं है,
यह मन की सच्ची भाषा है।
टूटे सपनों को जोड़ सके,
यह जीवन की परिभाषा है।
हर पंक्ति में विश्वास खिले,
हर शब्द नया साहस भर दे।
अंधियारे मन के आँगन में,
सूरज जैसी किरणें कर दे।
जो कह न पाए आँखों से,
वह कविता सहज कह जाती है।
भीतर छिपे हर दर्द को,
ममता से सहला जाती है।
क्रोध, निराशा, भय और पीड़ा,
सबका बोझ हल्का करती।
मुस्कानों के छोटे-छोटे
फूल हृदय में फिर से धरती।
रोज़ पाँच मिनट का यह संकल्प,
जीवन को उत्सव कर देगा।
तनावों के भारी बादल,
धीरे-धीरे दूर कर देगा।
-डी के कनौजिया