बेईमानी की तलाश
हर आदमी बेईमानी की तलाश में है,
और हर आदमी चिल्लाता है,
“बहुत बेईमानी है!”
कमाल है साहब,
चोर भी चौकीदार ढूँढ़ रहा है,
और चौकीदार भी चोर की तलाश में है।
जेब में ईमानदारी का कार्ड,
होंठों पर सच्चाई के भाषण,
और मौका मिलते ही
हिसाब में थोड़ा-सा फेरबदल
बस इतनी-सी तो
आजकल इंसानियत है!
रिश्वत लेने वाला कहता है “मैं मजबूर हूँ।”
रिश्वत देने वाला कहता है-“काम तो करवाना है।”
और दोनों मिलकर
व्यवस्था को कोसते हैं-“देश में बहुत भ्रष्टाचार है!”
सड़क पर नियम तोड़कर
हम व्यवस्था को गाली देते हैं,
टैक्स बचाकर
देशभक्ति के गीत गाते हैं,
झूठ बोलकर
सच्चाई पर प्रवचन करते हैं,
फिर आईना सामने आए
तो उसे ही दोष देते हैं।
बड़ी अजीब दुनिया है,
हर कोई दूसरे की
बेईमानी पकड़ना चाहता है,
मगर अपनी बारी आते ही
ईमानदारी की परिभाषा
थोड़ी बदल जाती है।
सच तो यह है, बेईमानी बाज़ार में नहीं,
हमारी आदतों में पलती है;
हम सब उसे ढूँढ़ते बहुत हैं,
बस एक जगह देखने से डरते हैं अपने भीतर!
और शायद इसी वजह से
हर आदमी चिल्लाता है-“बहुत बेईमानी है…”
क्योंकि उसे डर है,
कहीं कोई
उसका आईना न पढ़ ले!