कविता: बेचैनी
कैसा यह मानव का जीवन, कैसी यह गति, कैसा अभिमान?
सुख की खोज में निकला जग, खो बैठा अपना ही सम्मान।
स्वर्ण-महल के ऊँचे शिखरों पर, चिंता का पहरा बैठा है,
जिसने जग को जीत लिया, वह अपने मन से हार गया है।
विज्ञानों की विजय पताका नभ के शिखरों पर लहराई,
किन्तु हृदय की सूनी धरती पर, प्रेम-धारा क्यों न उतर पाई?
लोभ बना है आज पुरोहित, स्वार्थ बना है धर्म महान,
मानवता के पावन मंदिर में गूँज रहा केवल अपमान।
दौड़ रहा है जन-जन ऐसे, मानो काल पुकार रहा हो,
अपनों के ही बीच खड़ा मानव, अपनेपन को हार रहा हो।
अर्थ-सिंहासन ऊँचा करके, नीति को वनवास दिया है,
चैन खरीदने निकला मानव, जीवन ही गिरवी रख दिया है।
उठो मनुज! पहचान स्वयं को, तुम केवल बाजार नहीं हो,
तुम गंगा की निर्मल धारा, तुम मिट्टी का भार नहीं हो।
जिस दिन भीतर दीप जलेगा, मिट जाएगा तम का घेरा,
सत्य, त्याग, परिश्रम के आगे झुक जाएगा भाग्य अँधेरा।
मत पूछो सुख किसे मिलेगा, प्रश्न स्वयं से आज करो,
अपने अंतर्मन के आँगन में सत्य का प्रथम समाज धरो।
-डी के कनौजिया