क़द्र कीजिए कुछ लम्हे,
दुबारा लौटकर नहीं आते।
जैसे कि....
मेज़ पर रखी
उस चाय की तरह जो देर तक
किसी अपने के इंतज़ार में
धीरे-धीरे ठंडी हो जाती है।
फिर उसमें न भाप बचती है
न वही स्वाद
न वह पहली-सी ताज़गी।
रिश्ते भी कुछ ऐसे ही होते हैं,
उन्हें उपेक्षा की लंबी प्रतीक्षा में मत रखिए
कहीं ऐसा न हो कि...
उनकी गर्माहट सिर्फ स्मृति में रह जाए,
पर उन्हें जीने का समय हमेशा के लिए बीत जाए।
क्योंकि...
ठंडी चाय को फिर से गरम की जा सकती है,
पर ठंडे पड़ चुके एहसास हर बार ज़िंदा नहीं होते||