कभी मिलो अगर खुद से तुम
क्या गम की चादर को उतार आना
ढलते सूरज की उस लाली के आंचल में छुप जाना
उन उड़ते हुए पंचियो की चहचहाहट में तुम गुनगुनाना
उन बरसाती बारिश की बूंदों का तुम सुकून सा बन जाना
और उस गीली मट्टी की भीनी भीनी खुशबू में महक जाना
किसी गहरी गुफा में उतरते हुए रास्ते से तुम खुद में उतर जाना
किसी या कि धड़कन को सुनने से पहले तुम अपने दिल से हाथ मिलाना
दूर उस कोने से आती ऊर्जा की तलाश में तुम खुद में कहीं अंदर तक चले जाना
कोई आकर जब तुम्हें तुम्हारी कमी बताए
तो सब सुनके ख़ुशी से तुम धन्यवाद अदा करो आना
निकले हो जुस्तजू के जो इस रास्ते पर
इसे मुकम्मल किये बिना तुम लौट के मत आना
आइए अगर मलाल दिल में किसी के लिए कोई
तन्हाई के आलम में उसे कही दफ़न कर आना
हमें मलाल पे डालना तुम खुद से प्रेम की मिट्टी कोई
और खुशियों के पैगाम से उसे सींच कर आना
कभी मिलो अगर खुद से तुम
तो आइने में खुदको देखके जरूर मुस्कुरा देना