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अवध में बरखा

Aditi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घनघोर बदरवा बरसे रे
        
                                                    
                            
हो आज बदरवा बरसे रे
लोकै लागी चपला चम चम
आज बदरवा बरसे रे । घनघोर बदरवा बरसे रे
हीलै लागे हैं पेड़ सबै
ठंडी पुरवइया चलै लगी
जुर्रा ऊर्जा से उड़े लगे
गौरइया लिरिकन पास चली
गर्दा माटी उड़े लगी
पानी को नैना तरसे रे ।घनघोर बदलवा बरसे रे
बड़की बड़की बूंदे बरसी
भीतर तक सब मन भीज गए
सोंधी-सोंधी खुशबू फैली
है दयू गरज के बरस गए
पेड़े के पाती सीसा बनी गए
बैरन होई गए सरसे रे। घनघोर बदलवा बरसे रे
केहू पतोहिए घर का भागै
लरिका बच्चा खूब संभारै
केहू अंगना से कपड़ा टारै
कढ़ी पकौड़ी केहू बघारे
कागज के सर सर नाव चली
पायल के छन छन के रे। घनघोर बदरवा बरसे
फिर आंधी पानी खत्म भई
संझा तक दयू बरस गए
सब की खटिया बाहर बिछ गई
सबके जन-मन हरस गए
हम का ऐसी बरखा देखे हुए आज एक अरसे रे । घनघोर बदरवा बरसे
एक दिन पहले
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Aditya Mishra

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