गाँव के आख़िरी मोड़ पर
आज भी खड़ा है वह नीम,
जिसकी छाँव में बैठकर
बचपन ने सीखा था—
दोपहर कितनी लंबी होती है।
उसकी टहनियों पर
कभी हमारी पतंगें अटकती थीं,
और नीचे बैठकर दादा
किस्सों में पूरा संसार रच देते थे।
न कोई घड़ी थी,
न लौटने की जल्दी,
शाम होती थी तो
गाएँ घर लौटती थीं
और हम भी।
नीम के नीचे की मिट्टी में
हमने कितने सपने बोए थे,
कुछ बड़े होकर शहर चले गए,
कुछ वहीं रह गए—
उस नीम की जड़ों की तरह।
अब पक्की सड़क है,
बड़े-बड़े मकान हैं,
मोबाइल की रोशनी है,
पर वह अपनापन कहाँ है
जो मिट्टी के दीयों में जलता था?
दादा नहीं हैं,
दोस्त बिछड़ गए,
वह पुराना आँगन भी बदल गया—
लेकिन नीम अब भी खड़ा है,
जैसे गाँव की आख़िरी याद
हमें पुकार रही हो।
कभी लौटकर उसके नीचे बैठना,
शायद उसकी पत्तियों की सरसराहट में
तुम्हें अपना बचपन सुनाई दे—
क्योंकि गाँव कभी
सिर्फ़ जगह नहीं होता,
गाँव तो वह होता है
जहाँ लौटकर
इंसान फिर से
अपना बचपन बन जाता है।