आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गाँव के आख़िरी मोड़ पर

                
                                                         
                            गाँव के आख़िरी मोड़ पर
                                                                 
                            
आज भी खड़ा है वह नीम,
जिसकी छाँव में बैठकर
बचपन ने सीखा था—
दोपहर कितनी लंबी होती है।

उसकी टहनियों पर
कभी हमारी पतंगें अटकती थीं,
और नीचे बैठकर दादा
किस्सों में पूरा संसार रच देते थे।

न कोई घड़ी थी,
न लौटने की जल्दी,
शाम होती थी तो
गाएँ घर लौटती थीं
और हम भी।

नीम के नीचे की मिट्टी में
हमने कितने सपने बोए थे,
कुछ बड़े होकर शहर चले गए,
कुछ वहीं रह गए—
उस नीम की जड़ों की तरह।

अब पक्की सड़क है,
बड़े-बड़े मकान हैं,
मोबाइल की रोशनी है,
पर वह अपनापन कहाँ है
जो मिट्टी के दीयों में जलता था?

दादा नहीं हैं,
दोस्त बिछड़ गए,
वह पुराना आँगन भी बदल गया—
लेकिन नीम अब भी खड़ा है,
जैसे गाँव की आख़िरी याद
हमें पुकार रही हो।

कभी लौटकर उसके नीचे बैठना,
शायद उसकी पत्तियों की सरसराहट में
तुम्हें अपना बचपन सुनाई दे—

क्योंकि गाँव कभी
सिर्फ़ जगह नहीं होता,
गाँव तो वह होता है
जहाँ लौटकर
इंसान फिर से
अपना बचपन बन जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर