पूर्व दिशा के आँगन में,
किसने दीप जलाया है?
सोई हुई धरती को जैसे,
किसने फिर जगाया है?
स्वर्णिम किरणें लेकर सूरज,
चुपके से मुस्काता है,
फूलों की बंद पलकों पर,
ओस बनकर छाता है।
उसकी गर्मी से खेतों में,
अन्न सुनहरा होता है,
उसकी रोशनी पाकर ही,
जीवन आगे बढ़ता है।
पर्वत की ऊँची चोटी पर,
पहली किरण ठहर जाती,
नदियों के निर्मल जल में,
सोने-सी चमक बिखराती।
दिनभर नभ में चलता सूरज,
थकता फिर भी नहीं कभी,
देकर प्रकाश सभी को जग में,
रखता माँग अपनी कुछ नहीं।
शाम ढले जब लौटे सूरज,
रंग गगन में भर जाता,
जैसे कहता—“कल फिर आऊँगा,”
और अँधेरा डर जाता।
हे सूरज! तुम केवल तारा नहीं,
जीवन की उजली पहचान,
तुमसे ही धरती मुस्काती,
तुमसे रोशन सारा जहान।